Thursday, 5 July 2012

"जिंदगी अंगार की है, फिर भी तो हम जी रहे है"

कृति- मोहित पाण्डेय "ओम"

जिंदगी निष्ठुर है कितनी,
फिर भी तो हम जी रहे है |
अश्कों के सागर में डूबे,
आब-ए-तल्ख़ पी रहे है ||

उसने दिखाए थे जो सपने,
झूठ थे सब खल रहे है |
क्या निगाह थी उस हँसीं निगार की,
तसब्बुर में जिनके हम आजिज से हो रहे है||

कैसे बुझायें दिल की आतिश,
हर पल जो हम खुद जल रहे है |
अश्कों को अपने पी के खुद,
मन की आतिश बुझा रहे है||

कैसे भुलाएं वो कहानी,
जो जुबानी लिख रहे है |
प्रेम की ज्वाला थी तब,
अब तो हिम खुद बन रहे है ||

जिंदगी अंगार की है,
फिर भी तो हम जी रहे है||

1 comment:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (07-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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