Sunday, 2 September 2012

इन्सान

कृति -'जीतेन्द्र गुप्ता '

वक़्त की करवट में इन्सान बदल जाते हैं
हवा के एक झोंके में तूफान बदल जाते हैं
कभी फुरसत मिले तो सोचना ऐ दोस्त
मुश्किलों के थपेड़े तुम्हें कहाँ लिए जाते हैं ||
बनने को सोचा था क्या और बन गए हो क्या?
ऐसे ही नजाकत से क्या ईमान बदल जाते हैं?
बदले न खुद को जो जब लाख मुश्किलें आएँ
ऐसे ही इन्सान तो भगवान कहे जाते हैं ||
सह सके न वक्त की  जो जरा सी भी गर्दिश
ऐसे बुजदिल भी क्या इन्सान कहे जाते हैं|
रोते हैं इन्सान जो हरदम अपनी किस्मत को
ऐसे ही इन्सान तो बेकाम कहे जाते हैं ||
झेले चुनौतियों की आग को जो बिना डरे
कूद पड़े शोलों में कदम जिसके बिना थमे
ऐसे ही इन्सान तो फौलाद कहे जाते हैं |
सच्चा है इन्सान वो जो झेले गर्दिश सबकी
करता है जो काम वो बन जाता है मर्जी रब की ||
वरना हम इन्सान तो इक माटी के पुतले हैं |
बिना जोश के जो  बेजान कहे जाते हैं ||

1 comment:

  1. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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