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Tuesday, 27 December 2011

"मन-मकरंद"


"मन-मकरंद"
कृति - मोहित पाण्डेय "ओम" 
         (Mohit Pandey)


ऐ वो खुदा तू सुन ले जरा,
आज शिकायत भारी है|
क्या हाल बना रखा अपना,
ये कैसी मति हमारी है|
दोष क्या है मेरे माली,
तेरी ही तो फुलवारी है|
गर फूल कली वो तेरी है,
तो मै भी तेरा गैर नहीं|

चंचल चितवन नयन सुलोचन,
मधु भीनी वो पुष्प कली|
मधुपान मगन मै प्यासे अधरों से,
सीने में किसी के जलन जली|
अधिकार जताता रौद्र रूप वह,
उसकी है यह पुष्प कली|
कैद किया अपनी मुट्ठी में,
फिर वक्तव्य कहे कुछ अनजाने|

ऐ मकरंद यह मत आना,
कईयों ने जाने वारी है|
हतप्रभ सा हुआ वह मानव,
सुनकर मेरा प्रत्युत्तर
अमर प्रेम में मर बैठे हम,
चर्चा जगत विचारी है|
सुनते ही मसला उसने,
जान इश्क में वारी है|

 
ऐ वो खुदा तू सुन ले जरा,
आज शिकायत भारी है|
तू कहता मै मकरंद नहीं,
गर मै मधु निषेध करूँ|
दुनिया कहती है मतवाला,
गर मै मधुपान करूँ|
अब तू ही बता मेरे मौला,
क्या मै कर्त्तव्य विहीन मरूँ|

तू तो सबका मालिक है,
बस एक करम मेरा कर दे|
मेरे जीवन की हर खुशियाँ,
उस पुष्प कली 'छवि' में भर दे|

Wednesday, 16 November 2011

"नफरत-प्रेम"

नफरत-प्रेम 
कृति-मोहित पाण्डेय"ओम" 
 (ये पंक्तिया मैंने तब लिखी  जब उन्होंने हमसे ये जताया की वो हमसे अब नफरत करते है और हमें अहसास हुआ की वो हमारा नाम भी नहीं सुनना चाहते और न ही कोई मेल-मिलाप रखना चाहते है पर मुझ चकोर को आज भी उस चाँद की 'छवि' का इंतजार है जब वो उज्जवल धवल कोमल चांदनी में  प्रणय-लीला में मग्न हो जायेगा ) 

जो अपने थे कभी ,
वो आज दिली नफ़रत करते है |
और पराये दुनिया वाले ,
हमसे मुहब्बत करते है  |

ऐसे उम्मीद न थी उनसे ,
जिन्दा दिल दफ़न हमें करते है|
कह दो मेरे यारों उनसे ,
कब्र में मुर्दे दफ़न करते है |

हम तो जिन्दा दिल परवाने ,
जो प्रेम की लौ में जलते रहते है |

दोस्त हमारे हमसे पूछे ,
बताओ कौन है वो बेवफा |
बस दिल हमने लगाया उनसे,
यही थी यारों मेरी वफ़ा |

नफरत की सारी हदे उसने तोड़ी,
अब तो रचनाओ से भी नफ़रत करते है|

हम कहते है उनसे जो,
इतनी नफ़रत हमसे करते है|
नफरत की खातिर ही समझो,
कभी याद तो करते है| 


नफरत-प्रेम तो एक पहलु है,
जैसे रात्रि-दिवा और ऋतू परिवर्तन करते है |

हम तो दुःख में भी हसकर,
रहने की हिम्मत रखते है |
गर दिल तुमसे लगाया था,
आंसू सहने की हिम्मत भी रखते है|


इतनी नफरत वो हमसे,
कैसे कर सकते है|
शायद नफ़रत को प्रेम मानकर,
वो हमसे मुहब्बत करते है|

 

Tuesday, 15 November 2011

एक आस

एक आस 
कृति - मोहित पाण्डेय "ओम" 

आज भी दिल के मंदिर में ,
एक छवि संजों कर रखी है |
वो आएंगे जरूर ,
ये आस बना कर रखी है |

वो न भी आयें ,
तो दर्द न होगा |
अपनों से दर्द पाने की,
हमने आदत सी बना रखी है |

उन्हें कभी भी भूल पाना तो ,
मेरे लिए मुमकिन न होगा |
इसीलिए तो खुद की खातिर ,
हमने अपनी कब्र सजा रखी है |