Thursday, 16 August 2012

भारत माता की पुकार

कृति 'जीतेन्द्र गुप्ता '
बेकारी के आलम में ,लगता है हम भी खो जाएँ
रहने दें दुनिया जैसी है, दुनिया से बेसुध हो जाएँ |
बड़े कंटक हैं हर पग -पग में, इस जग सुधार के मारग पर
बड़े संकट हैं इस भारत में, हर दिल में बसा है भ्रष्टाचार
खड़े विषधर  है हर चौखट पर, कह रहे हैं वो ये पुकार पुकार
हम भले जगत से मिट जाएँ, मिटने ना देंगे भ्रष्टाचार ||
कहती है भारत माँ प्यारी, तुम हो मेरे कैसे सपूत !
जो बेच रहे हो खुद माँ को, अब तो सुधारों काले कपूत|
प्रण लो प्यारों अब इसी वक्त, खोया गौरव तुम लाओगे
बिलख रही है माँ प्यारी, इसे भ्रष्टाचार मुक्त कराओगे
यह ही है जननी हम सबकी, इसे जगद्गुरु तुम बनाओगे||

Tuesday, 14 August 2012

"ये दिल काँच का टूटा"

कृति - मोहित पाण्डेय"ओम"

इतना टूटा हूँ मैं , न अब कोई तोड़ पायेगा |
ये दिल काँच का टूटा, जिसे न कोई जोड़ पायेगा ||
कितनी भी कोशिशें, कोई भी अब तो कर ले|
बर्बाद रास्तों से हमें, न कोई मोड पायेगा ||

हमनें कभी न सोचा, ऐसा भी वक़्त आयेगा |
जो मुझको अपना कहता था, गैरों का हो जायेगा ||
कितनी बड़ी थी साजिश, जिसे हम समझ न पायें||
ये जो तूफां है मेरे दिल में, यें कही कहर ढाएगा||

मेरा दिल तो जल रहा है, वो यादों में कभी जलेगा |
जिन्दा था अब तलक मै, अब कोई मारने को आयेगा ||
सब लोग कल तो आना, मातम मनेगा मेरा |
मेरी मौत पे वो हंसकर, गैरो के संग जश्न मनाएगा ||

इतना टूटा हूँ मैं , न अब कोई तोड़ पायेगा |
ये दिल काँच का टूटा, जिसे न कोई जोड़ पायेगा ||

Monday, 6 August 2012

“निवेदन”

कृति- जीतेंद्र गुप्ता


एक छोटी सी बच्ची देखी

भोली सी उसकी सूरत थी

आँखों में उसके सपने थे

लगते जो उसके अपने थे

घर में सबकी दुलारी थी

लगती सबको प्यारी थी ||

पर उससे रब रुठ गया
उसका सबकुछ लूट गया

एक हवा का झोंका आया

माँ बाप का दामन छूट गया ||

फिर से उस बच्ची को देखा

मलिन सी उसकी सूरत थी

ना ही आँखों में सपने थे

ना कोई उसके कोई अपने थे ||

कौन उसे अब अपनाएगा

उसका अपना बन पाएगा |

मेरी एक अपील है भाई

दिल से जानो एक सच्चाई

जिन्हें नही पैसे का लोभ

ऐसे दुनिया में कम लोग

उनसे जीतेन्द्र का निवेदन है भाई

ब्याह लाओ ऐसी लुगाई

जिसके नहीं  है बाप - मताई ||