Monday, 6 August 2012

“निवेदन”

कृति- जीतेंद्र गुप्ता


एक छोटी सी बच्ची देखी

भोली सी उसकी सूरत थी

आँखों में उसके सपने थे

लगते जो उसके अपने थे

घर में सबकी दुलारी थी

लगती सबको प्यारी थी ||

पर उससे रब रुठ गया
उसका सबकुछ लूट गया

एक हवा का झोंका आया

माँ बाप का दामन छूट गया ||

फिर से उस बच्ची को देखा

मलिन सी उसकी सूरत थी

ना ही आँखों में सपने थे

ना कोई उसके कोई अपने थे ||

कौन उसे अब अपनाएगा

उसका अपना बन पाएगा |

मेरी एक अपील है भाई

दिल से जानो एक सच्चाई

जिन्हें नही पैसे का लोभ

ऐसे दुनिया में कम लोग

उनसे जीतेन्द्र का निवेदन है भाई

ब्याह लाओ ऐसी लुगाई

जिसके नहीं  है बाप - मताई ||

Saturday, 4 August 2012

हाइकु, लिखने की एक कोशिश

कृति- मोहित पाण्डेय"ओम"

१. शीशा तोड़ दे ...
ये उनकी अदा है...
जख्म देने की ....


२. तेज धूप है...
सूरज जवान है....
फिर बारिश ....

३. रो रहा होगा..
दिल टूटने पर ...
ये आसमान ....


४. दंगा फसाद...
इंसानियत मरी
नेता का काम .....

५. तू डर गया?
बाजू में दम नहीं ?
है शिकश्त दे....

Thursday, 2 August 2012

"हँसने की कोशिश करते है"

कृति -- मोहित पाण्डेय"ओम"


गम के सागर में डूबे रहते है,
फिर भी हँसने की कोशिश करते है|
ये जमाना अगर हमसे रूठे भी तो,
हम तो अपने ही जलवे में रहते है ||

उनको नफरत है हमसे तो हम क्या करे,
हम तो अब भी मोहब्बत करते है |
कोई पागल कहे, आवारा कहे,
उनकी गलियों में जाया करते है||

तुम दीवानों की बातें मत करना,
वो तो मर के भी जिन्दा रहते है|
कभी उसने हमें अपना माना था,
हम तो अपनों को दिल में रखते है||

है वो पागल जो गैरो पे मरते है,
हम तो अपनों कि खातिर जीते है|
मेरी आँखों में आँसू रहते है,
फिर भी हँसने की कोशिश करते है||
गम के सागर में डूबे रहते है ...........