"देशद्रोही आज के"
कृति-मोहित पाण्डेय"ओम" (Mohit Pandey)
देखो ये कैसे हालात आ रहे है,
मानव हुए दानव खुद को सता रहे है|
खादी की पैबस्त में देश को लूटा,
अब गाँधी नाम को भी बदनाम कर रहे है|
गाँधी तो वो था जो एक पतलून में रहता था,
पर ये देशद्रोही भ्रष्ट जामा पहन रहे है|
वो महात्मा सत्य-अहिंसा का पुजारी था,
पर ये दुष्ट मजहबी विभाजन करा रहे है|
ठण्ड में ठिठुरता गरीब देश पर रोता है,
कि ये मेरा पैसा स्विस में खुद के नाम कर रहे है|
देश के सिपाही सीमा में जान गवाते है,
जमाई बने कसब जैसे यह मौजे मना रहे है|
हम शान से कहते है देश हमारा है,
लेकिन यहाँ शासन विदेशी चला रहे है|
हम जानते है एक दिन ये देश बेंच देंगे,
फिर भी क्यों उन पर मुहरें लगा रहे है|
आज भी कुछ बिगड़ा नहीं,
सब होशो-हवाश में आओ|
सभी मजहबी मिल कर खड़े हो,
फिर भारत माँ के नारे लगाओ|
सपूत भारती के हममे है दम,
अब देश के दुश्मनों को बताओ|
शिकस्त हार देकर इन्हें,
अपनी मात्र-भूमि से खदेडकर भगाओ|
हिंदी और हिंदी साहित्य को आसमां तक पहुचाने का प्रयास एक नए दृष्टिकोण के साथ ..
Thursday, 19 January 2012
Monday, 16 January 2012
खुशी के रंग
खुशी के रंग
कृति: Jagesh Jags
रंगों के बिच
रंगीन भंवर में
गर कही ,रंग मेरा, रंगत मेरी
रंग रंगीली हरकत
मेरी
रंग न पाई रंगों से तो
रंग कही ये उड़ न
जाये
उन रंगीन आँखों से
आँखों का रंग ,
रंग नहीं है
रंगों का सैलाब भरा
रंग बड़ा रंगीन
है ये रंगों के सागर से बना
रंगना मुझको बहुत
अभी है ,
उन आँखों को रंगने के लिए
एक रंग फिर ऐसा
भी हो
रंग रंगीली आँखों को जब,
भायेगा ये रंग मेरा
तब होगी रंगीन रंगीन दुनिया
रंग रंग से भरी हुई, कई रंगों से सजी हुई
उन आँखों में भी रंग दिखेंगे
होगी खुशिया भी रमी हुई.
कृति: Jagesh Jags
रंग रंग में रंग जायेगा
रंगों की दुनिया में,
रंगीली डुबकिय रंगों के
दरिया में,
गर कही ,रंग मेरा, रंगत मेरी
रंग न पाई रंगों से तो
उन रंगीन आँखों से
रंगों का सैलाब भरा
उन आँखों को रंगने के लिए
रंग रंगीली आँखों को जब,
तब होगी रंगीन रंगीन दुनिया
रंग रंग से भरी हुई, कई रंगों से सजी हुई
होगी खुशिया भी रमी हुई.
Friday, 13 January 2012
भ्रूण हत्या: एक अभिशाप
भ्रूण हत्या: एक अभिशाप
कृति: मोहित पाण्डेय "ओम" (Mohit Pandey)
हे जननी दोष क्या था उस अबोध का?
जो जन्म उसे ना लेने दिया|
करुनामयी ममता की मूरत तू,
फिर भी क्यों उसको मार दिया?
ऐसी भी क्या विपत पड़ी?
जो खुद के खून का क़त्ल किया|
कोख में पलकर उसने भी कुछ सपने देखे होंगे,
फिर क्यों उसको अपने सपनो में रंग न तुमने भरने दिया?
बेटे की चाह में अंधी होकर,
खुद अपनी बेटी को मार दिया|
जितनी सेवा बेटा कर न सका,
बेटी उससे ज्यादा कर पायी है|
बेटी खुद होकर भी तू,
खुद बेटी को समझ ना पाई है|
तुमने शायद सोचा होगा,
बेटी आई तो बड़ी मुसीबत आएगी|
पर तुमने ये क्यों ना सोचा,
बिन बेटी स्रष्टि कैसे चल पायेगी?
कृति: मोहित पाण्डेय "ओम" (Mohit Pandey)
हे जननी दोष क्या था उस अबोध का?
जो जन्म उसे ना लेने दिया|
करुनामयी ममता की मूरत तू,
फिर भी क्यों उसको मार दिया?
ऐसी भी क्या विपत पड़ी?
जो खुद के खून का क़त्ल किया|
कोख में पलकर उसने भी कुछ सपने देखे होंगे,
फिर क्यों उसको अपने सपनो में रंग न तुमने भरने दिया?
बेटे की चाह में अंधी होकर,
खुद अपनी बेटी को मार दिया|
जितनी सेवा बेटा कर न सका,
बेटी उससे ज्यादा कर पायी है|
बेटी खुद होकर भी तू,
खुद बेटी को समझ ना पाई है|
तुमने शायद सोचा होगा,
बेटी आई तो बड़ी मुसीबत आएगी|
पर तुमने ये क्यों ना सोचा,
बिन बेटी स्रष्टि कैसे चल पायेगी?
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