Sunday, 14 April 2013

"एकमात्र संतोष "


कृति- “जीतेन्द्र गुप्ता”

वर्षों से खुलकर  नहीं हंसा
पर सिसक सिसक रोया तो है
तसवीर तेरी दिल में रखकर
तेरे सपनों में खोया तो है
सच्चाई  में तो मिली नही
पर सपनों में आई तो है
तेरी हर एक याद संजोकर
दिल में दफनाई तो है
जिन्दा रहते तो मिली नहीं
पर मुझको अब संतुष्टि ये है
मेरी लाश पर अश्क बहाने
देखो वो  आई तो है....... 

Sunday, 10 March 2013

कृति 'जीतेन्द्र गुप्ता '
बेकारी के आलम में ,लगता है हम भी खो जाएँ
रहने दें दुनिया जैसी है, दुनिया से बेसुध हो जाएँ |
बड़े कंटक हैं हर पग -पग में, इस जग सुधर के मारग पर
बड़े संकट हैं इस भारत में, हर दिल में बसा है भ्रष्टाचार
खड़े विषधर  है हर चौखट पर, कह रहे हैं वो ये पुकार पुकार
हम भले जगत से मिट जाएँ, मिटने ना देंगे भ्रष्टाचार ||
कहती है भारत माँ प्यारी, तुम हो मेरे कैसे सपूत !
जो बेच रहे हो खुद माँ को, अब तो सुधारों काले कपूत|
प्रण लो प्यारों अब इसी वक्त, खोया गौरव तुम लाओगे
बिलख रही है माँ प्यारी, इसे भ्रष्टाचार मुक्त कराओगे
यह ही है जननी हम सबकी, इसे जगद्गुरु तुम बनाओगे||

Thursday, 22 November 2012

शहीदों को समर्पित एक कविता ...


एक दिन कलम ने आके चुपके से मुझसे ये राज खोला ,
कि रात को भगत सिंह ने सपने में आकर उससे बोला,

कहाँ गया वो मेरा इन्कलाब कहाँ गया वो बसंती चोला ?
कहाँ गया मेरा फेंका हुआ, मेरे बम का वो गोला ?

आत्मा ने भगत के आकर कहा , ये देख के हम बहुत शर्मिंदा हैं,
कि देश देखो आज जल रहा है,और जवान यहाँ अभी भी जिन्दा हैं ??

देख के वो रो पड़ा इस देश की अंधी जवानी ,
क्या हुआ इस देश को जहाँ खून बहा था जैसे हो पानी ,

खो गया लगता जवान आज जैसे शराब में ,
खो गया आदतों में उन्ही , जो आते हैं खराब में ,

कीमतें कितनी चुकाई थी हमने, ये तो सब ही जानते हैं
तो फिर इस देश को हम आज , क्यूँ नही अपना मानते हैं ?

देश के संसद पे आके वो फेंक के बम जाते हैं ,
और खुदगर्जी में हम सब उन्हें अपना मेहमां बनाते हैं ,

भूल गये हो क्या नारा तुम अब इन्कलाब का ???
जो पत्थरों के बदले में भी थमाते हो फुल तुम गुलाब का ?

मानने को मान लेता मानना गर होता उसे ,
जान लेता हमारे इरादे गर जानना होता उसे ,

आँखों में आंसू आ गया, देख के अब ये जमाना ,
लगता है आज बर्बाद अब , हमको अपना फांसी लगाना ,

ऐ जवां तुम जाग जाओ तुम्हे देश ये बचाना होगा ,
आज आजाद और भगत बन के तुम्हे ही आगे आना होगा

ऐ जवां तुम्हे नहीं खबर ,कि जब-जब चुप हम हो जाते हैं
देश के दुश्मन हमे तब-तब, नपुंसक कह- कह कर के बुलाते हैं,

उठो और लिख दो आज फिर से, कुछ और कहानियाँ ,
कह दो जिन्दा हैं अभी हम और सोयी हैं नही जवानियाँ,

गर लगी हो जवानी में, जंग, तो हमसे तुम ये बताओ ,
या खून में उबाल हो ना , तो भी बस हमसे सुनाओ,

एक बार फिर से हम इस मिटटी के लाल बन के आयंगे ,
एक बार इस देश को अपनों के ही गुलामी से हम बचायेंगे ,

नारा इन्कलाब का हम फिर से आज लगायेंगे ..
पर ये सवाल हम आप से फिर भी बार-बार दुहराएंगे,

कि आखिर कब तक ?? आखिर कब तक ?
इस देश के जवां कमजोर और बुझदिल कहलाते जायंगे.....
इसको बचाने खातिर कब, तक भगत सिंह और आजाद यहाँ पर आयंगे ???
 
Rajeev Kumar Pandey " Mahir "

Tuesday, 20 November 2012

क्या तुमने ऐसा अधम कुकृत्य किया होता ???


कल शहर के राह  पर मैंने भीड़ देखा था ,
जहाँ एक नवजात कन्या को उसकी माँ ने फेंका था ,

मै बेबस था चुपचाप था बहुत परेशान था ,

मै उस नवजात की माँ की ममता पे बहुत हैरान था  , 


मै कुछ नही कह सकता था उस भीड़ से , क्युं कि मै भी एक इंसान था ,

पर क्या उस कुछ देर पहले जन्मी बच्ची  का नही कोई भगवान था ?? 


क्या उस माँ की कोख ने उस माँ को नही धिक्कारा होगा  ?

क्या उस नवजात की चीख ने उस माँ को नही पुकारा होगा ? 


आखिर क्यूँ जननी काली  से कलंकिनी  बन जाती है ? 

जन्मती है कोख से और फिर क्यूँ कूड़े पे फेंक आती है ? 


गर है ये एक पाप , तो क्यूँ माँ करती है उस पाप को ?

क्या शर्म नही आती उस बच्ची के कलंक कंस रूपी के बाप को ? 


बिलखते हैं, चीखते हैं मांगते हैं रो-रो कर भगवान से ,

जो की दूर हैं एक भी संतान से , 

  उस नवजात को मारने  की वजह बढती हुई दहेज तो नही ?
 कुछ बिकी हुई जमीरों के लिए लकड़ियों की कुर्सी मेज तो नही ?

कुछ बिके हुए समाज के सोच की  नग्नता का धधकता तेज तो नही ?

 इस नवजात की मौत की वजह  किसी के हवस की शिकार सेज तो नही ? 

बस एक बात पूछता हूँ उस समाज से , उस माँ से ,और उस भगवान से

क्यूँ खेलते हों मूक  निर्जीव सी नन्ही सी जान से  ?? 


आखिर क्यूँ मानवता पे यूँ गिरी है ये गाज ?

जिस माँ ने फेंका था उस नवजात को, उसी माँ से पूछना चाहता हूँ मै  आज ..  


क्या तुमने ऐसा अधम कुकृत्य किया होता ?

अगर तुम्हारी माँ ने भी तुम्हे अपने कोख से निकाल फेंक दिया होता ??????? 

Rajeev Kumar Pandey " Mahir "

Tuesday, 30 October 2012

तुम साथ होते तो अच्छा होता

हमें मोहब्बत करना सिखा तो दिया,
साथ निभाना तुम भी सीख जाते,
तो अच्छा होता|

तुम्हारे गम ने दर्द तो बहुत दिया,
थोडा सा बाँट ही लेते,
तो अच्छा होता|

तुम्हारा नाम लेके बदनाम मै हुआ,
थोडा तुम भी हो लेते,
तो अच्छा होता|

हमें पीने को जहर दे तो दिया,
तुम पिला भी देते,
तो अच्छा होता|

जिंदगी भर का दर्द साथ ले लिया,
काश!!! तुम साथ होते,
तो अच्छा होता|||

Sunday, 2 September 2012

इन्सान

कृति -'जीतेन्द्र गुप्ता '

वक़्त की करवट में इन्सान बदल जाते हैं
हवा के एक झोंके में तूफान बदल जाते हैं
कभी फुरसत मिले तो सोचना ऐ दोस्त
मुश्किलों के थपेड़े तुम्हें कहाँ लिए जाते हैं ||
बनने को सोचा था क्या और बन गए हो क्या?
ऐसे ही नजाकत से क्या ईमान बदल जाते हैं?
बदले न खुद को जो जब लाख मुश्किलें आएँ
ऐसे ही इन्सान तो भगवान कहे जाते हैं ||
सह सके न वक्त की  जो जरा सी भी गर्दिश
ऐसे बुजदिल भी क्या इन्सान कहे जाते हैं|
रोते हैं इन्सान जो हरदम अपनी किस्मत को
ऐसे ही इन्सान तो बेकाम कहे जाते हैं ||
झेले चुनौतियों की आग को जो बिना डरे
कूद पड़े शोलों में कदम जिसके बिना थमे
ऐसे ही इन्सान तो फौलाद कहे जाते हैं |
सच्चा है इन्सान वो जो झेले गर्दिश सबकी
करता है जो काम वो बन जाता है मर्जी रब की ||
वरना हम इन्सान तो इक माटी के पुतले हैं |
बिना जोश के जो  बेजान कहे जाते हैं ||

Friday, 17 August 2012

::मदिरा-मय मस्त मगन बूंदे:: एक प्रेमी का मदिरा से वार्तालाप


कृति -- मोहित पाण्डेय"ओम "

इस रचना में मैंने एक प्रेमी और मदिरा के बीच हुए वार्तालाप को पिरोया
है| जब एक प्रेमिका अपने प्रेमी को
अपनी सहेली की हाथो ये संदेश भेजती है की अब उन दोनों के बीच सब कुछ खत्म
हो गया है,उसे अब उसकी जरुरत नहीं रही क्यूकि उससे अच्छा एक रिश्ता उसके
लिए आया है| वो उसे भूल जाये|
ऐसा पढकर उसका पूरा तन बदन सुन्न हो गया, वो खो गया उन पुरानी यादो में
जिनमे उन दोनो ने कभी साथ निभाने और संग जीने-मरने कि कसमें खायी थी,
आखिर एक पल में वो सारी कसमें झूठी वो गयी|
क्या उसका प्यार एक फरेब था?
पुरानी यादो की हिलोरो को अपने जेहन में समेटे हुए वो मैखाने की तरफ चल
पड़ता है| साकी से जाम लाने के लिए कहता है|
"साकी अब तो मान ले, या मनवा कि बात|
जी भर जाम पिलाय दे, जागूँ पूरी रात || "
साकी ने जाम भरकर रख दिया है, अब मदिरा और उसका वार्तालाप शुरू होता है|

 
ये कैसा नशा मुझ पर  छाया,
 जो न पिया अपने अधरों से |
 होश-हवाश सुध-बुध खो बैठे,
 इस मधुर पान की प्याली से||१ 

   धूम्रपान  और  मधपान  हम, 
 सुनते   आये   थे   कानो  से |
 छलक रही प्याली मदिरा की,
 हमने  न  लगाया  अधरों से ||२

 फिर  भी कैसा  नशा हुआ  है,
 हुए  आज  हम  मतवारे  से |
 मदिरा-मय मस्त मगन बूंदे,
 करती  है निवेदन अधरों से ||३

  प्यारे खुद को   सिंचित कर ले,
प्यारी  मदिरा  की  सरिता से |
अपने गमो को कर दे प्रवाहित,
चंचल   मतवाली   लहरों   से ||४

ये जो नशा है तुम पर छाया,
पाया   तुमने   हरजाई   से |
वफ़ा  के  बदले   पाया  क्या,
तू  तड़प  उठा  बेवफाई  से ||५ 

                                                       बस आज तू मुझको अपना बना ले,
हर   लूँगी   व्यथा   एक  प्याली  से |
साथ     न    तेरा     मैं       छोडूँगी ,
वादा है रक्त-चमक मद-छलको से||६

मदिरा-मय मस्त मगन बूंदे,
करती है  निवेदन  अधरों से||

                                                          साथ   में   लेकर   अपने   चलना,
खेलेंगे    चिता    की    लपटों  से |
 दिल की 'छवि' में मुझको बसा ले,
 भर   दूंगी   दमन   खुशियों   से ||७

सुनकर दिल ने कड़क लगाई,
रिश्ता   है   तेरा   मैखाने   से|
दिल  न  लगाना  तुम  हमसे,
हम      दीवाने     है    उसके ||८ 

                                                              दिल में तो वो 'छवि' बसी है,
जगह   न   तू   ले   पायेगी |
 जी-जान से   कोशिश करले, 
  तू न भ्रमित हमें कर पायेगी||९


वो      अमृत     का     सागर    है,
विष   से   है   भरी   तेरी   प्याली|
वो पूनम के निशा सी उज्जवल है,
तू   मावस   की घोर   घटा  काली||१० 

                                                            तू  रक्त-तप्त डूबे   सूरज सी,
वो   उगते   भानु   की   लाली |
 गर  तू   दुःख   को  मिटाती  है,
 खुशियों  से भरी  वो हरियाली||११

माना की  खफा है वो  हमसे,
दूर   न  ज्यादा   रह   पाएंगे|
दौड़े    आएंगे    एक     दिन,
फिर  दिल  से हमें  लगाएंगे ||१२ 

                                                              उनकी अनुपस्थति में हम,
 सौतन से दिल न  लगाएंगे|
ऐसा अधरम  करके    हम, 
       खुद  की  नजरों में गिर जायेंगे||१३

प्यारी   मोहक    मन-मादक,
मदिरा  ने सुने जब प्रत्युत्तर|
सभी    यहाँ    दीवाने    उसके,
आँखों में सभी की मद-लाली||१४ 

                                                            ये कैसा  शख्स यहा पर आया,
क्रोध से  रक्तिम मद  प्याली|
तीक्ष्ण  नयन  अरु   मंदहास ,
कर्कश ध्वनि में मदिरा बोली||१५

तू  कितने भी  अश्रु  बहा ले,
याद  उसे  न  अब  आयेगी |
जीवन भर तू आस  लगा ले,
वो  न  वापस  अब आयेगी ||१६ 

ऐसी     उम्मीद      तुझे     न    थी,
वो दिल के इतने टुकड़े कर डालेगी|
दामन   थाम   किसी   जालिम  का,
जला-जला       तुझको      मारेगी ||१७

प्यार    के   सागर  में      तुमने,
गोते       बहुत       लगाएँ     थे |
जिन-जिन  को  अपना  समझा,
सब  दिल में शोले भरने आए थें||१८ 

कैसा   जहर    उसने    दे    डाला,
आँखों से अब तक निकल रहा है |
याद     उसे     कर-करके     क्यों,
हर   पल  खुद  को  जला  रहा है ||१९

दिल के दर्पण में देखो तो,
उसकी 'छवि' ही प्रतिबिंबित है |
मन-मानस में जो फूल खिले है,
सब मेरे नयनों से सिंचित है ||२० 

                                                            हमने किसी का क्या बिगाड़ा,
                                                            ये कैसी सजा अब मिल रही है |
                                                             जिसने हमारा हाथ थामा, 
                                                             अब वो रेत बनकर दूर हमसे हो रही है ||२१

मै कैसे तुमको खुद में बसा लूँ,
कैसे तुम्हे अपना बना लूँ |
इस दिल में जब चिंगारी उठी है,
कैसे अब उसको बुझा दूँ ||२२ 

                                                             मै नागमणि था, अब मणि 
                                                             क्यूँ दूर जाना चाहती है |
                                                             निस्तेज विषधर को अभी भी,
                                                             क्यूँ तू सोमरस पिलाना चाहती है ||२३ 




मदिरा-मय मस्त मगन बूंदे,
करती है निवेदन अधरों से|
................शेष जल्द ही ..

Thursday, 16 August 2012

भारत माता की पुकार

कृति 'जीतेन्द्र गुप्ता '
बेकारी के आलम में ,लगता है हम भी खो जाएँ
रहने दें दुनिया जैसी है, दुनिया से बेसुध हो जाएँ |
बड़े कंटक हैं हर पग -पग में, इस जग सुधार के मारग पर
बड़े संकट हैं इस भारत में, हर दिल में बसा है भ्रष्टाचार
खड़े विषधर  है हर चौखट पर, कह रहे हैं वो ये पुकार पुकार
हम भले जगत से मिट जाएँ, मिटने ना देंगे भ्रष्टाचार ||
कहती है भारत माँ प्यारी, तुम हो मेरे कैसे सपूत !
जो बेच रहे हो खुद माँ को, अब तो सुधारों काले कपूत|
प्रण लो प्यारों अब इसी वक्त, खोया गौरव तुम लाओगे
बिलख रही है माँ प्यारी, इसे भ्रष्टाचार मुक्त कराओगे
यह ही है जननी हम सबकी, इसे जगद्गुरु तुम बनाओगे||

Tuesday, 14 August 2012

"ये दिल काँच का टूटा"

कृति - मोहित पाण्डेय"ओम"

इतना टूटा हूँ मैं , न अब कोई तोड़ पायेगा |
ये दिल काँच का टूटा, जिसे न कोई जोड़ पायेगा ||
कितनी भी कोशिशें, कोई भी अब तो कर ले|
बर्बाद रास्तों से हमें, न कोई मोड पायेगा ||

हमनें कभी न सोचा, ऐसा भी वक़्त आयेगा |
जो मुझको अपना कहता था, गैरों का हो जायेगा ||
कितनी बड़ी थी साजिश, जिसे हम समझ न पायें||
ये जो तूफां है मेरे दिल में, यें कही कहर ढाएगा||

मेरा दिल तो जल रहा है, वो यादों में कभी जलेगा |
जिन्दा था अब तलक मै, अब कोई मारने को आयेगा ||
सब लोग कल तो आना, मातम मनेगा मेरा |
मेरी मौत पे वो हंसकर, गैरो के संग जश्न मनाएगा ||

इतना टूटा हूँ मैं , न अब कोई तोड़ पायेगा |
ये दिल काँच का टूटा, जिसे न कोई जोड़ पायेगा ||

Monday, 6 August 2012

“निवेदन”

कृति- जीतेंद्र गुप्ता


एक छोटी सी बच्ची देखी

भोली सी उसकी सूरत थी

आँखों में उसके सपने थे

लगते जो उसके अपने थे

घर में सबकी दुलारी थी

लगती सबको प्यारी थी ||

पर उससे रब रुठ गया
उसका सबकुछ लूट गया

एक हवा का झोंका आया

माँ बाप का दामन छूट गया ||

फिर से उस बच्ची को देखा

मलिन सी उसकी सूरत थी

ना ही आँखों में सपने थे

ना कोई उसके कोई अपने थे ||

कौन उसे अब अपनाएगा

उसका अपना बन पाएगा |

मेरी एक अपील है भाई

दिल से जानो एक सच्चाई

जिन्हें नही पैसे का लोभ

ऐसे दुनिया में कम लोग

उनसे जीतेन्द्र का निवेदन है भाई

ब्याह लाओ ऐसी लुगाई

जिसके नहीं  है बाप - मताई ||

Saturday, 4 August 2012

हाइकु, लिखने की एक कोशिश

कृति- मोहित पाण्डेय"ओम"

१. शीशा तोड़ दे ...
ये उनकी अदा है...
जख्म देने की ....


२. तेज धूप है...
सूरज जवान है....
फिर बारिश ....

३. रो रहा होगा..
दिल टूटने पर ...
ये आसमान ....


४. दंगा फसाद...
इंसानियत मरी
नेता का काम .....

५. तू डर गया?
बाजू में दम नहीं ?
है शिकश्त दे....

Thursday, 2 August 2012

"हँसने की कोशिश करते है"

कृति -- मोहित पाण्डेय"ओम"


गम के सागर में डूबे रहते है,
फिर भी हँसने की कोशिश करते है|
ये जमाना अगर हमसे रूठे भी तो,
हम तो अपने ही जलवे में रहते है ||

उनको नफरत है हमसे तो हम क्या करे,
हम तो अब भी मोहब्बत करते है |
कोई पागल कहे, आवारा कहे,
उनकी गलियों में जाया करते है||

तुम दीवानों की बातें मत करना,
वो तो मर के भी जिन्दा रहते है|
कभी उसने हमें अपना माना था,
हम तो अपनों को दिल में रखते है||

है वो पागल जो गैरो पे मरते है,
हम तो अपनों कि खातिर जीते है|
मेरी आँखों में आँसू रहते है,
फिर भी हँसने की कोशिश करते है||
गम के सागर में डूबे रहते है ...........

Wednesday, 25 July 2012

भूले-बिसरे

मोहित पाण्डेय "ओम"

१.    जिंदगी को जिस तरह हमने जिया, 
       शायद ही कोई शक्सियत जी पायेगी |
       उनके होंठों से जाम हमने पिया ,
       हमें न अब कोई दूजी जाम भाएगी ||

       वो तो चले गए हमें मदहोश करके,
       मगर उनसे जुदाई और गम-ए-उल्फत में ये जान चली जायेगी|
       मगर अफ़सोस, तब ये मदहोशी हमेशा की हो जायेगी |
       गर फक्र है, कभी हमारी भी इश्क-ए-दास्ताँ इबारत पढ़ी जायेगी ||

२.    इतना मत सताओ हमें, हम तेरा शहर छोड़ जायेंगे |
       जान मांग कर के तो देख, तेरी ही चौखट पे दम तोड़ जायेंगे|
       दीवाने तो मरते ही है यहाँ, पर हम अपनी आशिकी की एक मिशाल छोड़ जायेंगे |
       फिर अपनी मोहब्बत का इजहार मत करना, क्यों कि कब्र में दफ़न हम दिल्लगी कर न पाएंगे 

३.    सोचा था मुहब्बत न करेंगे, क्यों कि इसमें दर्द-ए-सुरूर होता है|
       फिर दिल ने आवाज दी लगा ले दिल, बिना दिल्लगी के कौन यहाँ मशहूर होता है||

Thursday, 5 July 2012

"जिंदगी अंगार की है, फिर भी तो हम जी रहे है"

कृति- मोहित पाण्डेय "ओम"

जिंदगी निष्ठुर है कितनी,
फिर भी तो हम जी रहे है |
अश्कों के सागर में डूबे,
आब-ए-तल्ख़ पी रहे है ||

उसने दिखाए थे जो सपने,
झूठ थे सब खल रहे है |
क्या निगाह थी उस हँसीं निगार की,
तसब्बुर में जिनके हम आजिज से हो रहे है||

कैसे बुझायें दिल की आतिश,
हर पल जो हम खुद जल रहे है |
अश्कों को अपने पी के खुद,
मन की आतिश बुझा रहे है||

कैसे भुलाएं वो कहानी,
जो जुबानी लिख रहे है |
प्रेम की ज्वाला थी तब,
अब तो हिम खुद बन रहे है ||

जिंदगी अंगार की है,
फिर भी तो हम जी रहे है||

Thursday, 31 May 2012

"फिर से-लंबी रातें उसकी यादें"

"फिर से-लंबी रातें उसकी यादें"

कृति- मोहित पाण्डेय"ओम"

फिर से आज एकाकीपन है,
फिर से रोया ये तन मन है|
फिर  से   रात  नहीं  गुजरी,
यादो  से आंखे फिर नम है||

फिर से मैं खुद को भूल गया,
उन  लम्हों में फिर डूब गया|
फिर से मैं  इतना  टूट  गया, 
वो शक्स हमें फिर लूट गया||

फिर  से  ये  रात  सुहानी  है,
फिर  से  पूनम की चांदनी है,
वो  रातें   कितनी  छोटी  थी,  
इतनी लंबी रातें हमने अब जानी है||

फिर  से  मेरा  मन  पागल है,
उस छवि को फिर से ढूढ रहा|
कैसे  समझाऊ  मैं  खुद  को,
जो   मेरा  था अब वो न रहा||
 
वो मुझको अपना कहता थी, 
हर पल  संग  में  रहती थी|
गर   चोट हमें लग जाती थी,
तो दर्द के आँसू वो रोती थी||

फिर क्यों आज हमें वो छोड़ गयी,
क्यों  हर  नाते हमसे  तोड़ गयी|
ये    दिल  भी  तो  तुम्हारा  था,
क्यों फिर इसको तनहा छोड़ गयी||

ये रातें कितनी लंबी है, क्यों हमको अकेला छोड़ गयी||


Friday, 4 May 2012

दिल की हसरत

दिल की हसरत

दिल की हसरत है कि बस तेरा दीदार करूं|
सिर्फ दो पल के लिए ही सही, जी भर के तुम्हे प्यार करूं|

चाँद तो सिर्फ रातों में निखरता है,
हर एक पल निखरे हुए चाँद से इजहार करूँ|

इतनी प्यारी मुस्कराहट है तेरी,
उस पे सौ बार जिंदगियाँ कुर्बान करूं|

दिल की हसरत है कि बस तेरा दीदार करूं|
सिर्फ दो पल के लिए, तुम्हे जी भर के प्यार करूं|

तेरे दांतों से चाँद को जो चांदनी मिलती, उससे अपने दिल का श्रृंगार करूँ|
सिर्फ दो पल के लिए ही सही, जी भर के तुम्हे प्यार करूं|

Wednesday, 25 April 2012

"अपना बना लीजिए"

कृति-- मोहित पाण्डेय "ओम"

अपनी नजरों में हमको बसा लीजिए,
हमको इतनी  बड़ी अब सजा दीजिए |
सब  दीवाने  तुम्हारे है  तो  क्या  हुआ,
अब तो हमको भी अपना बना लीजिए||

अपने    चेहरे   से   घूँघट   हटा   दीजिए,
इन काली घटाओं में खुद को समां लीजिए|
इश्क   में   हम     बेहोश  तो     क्या   हुआ.
अपने     होंठों  से    मदिरा   पिला दीजिए ||

इन  तीखी  निगाहों  से  न   क़त्ल कीजिये,
हमसे करके मुहब्बत अपना बना लीजिए|
तेरे  इश्क  में बदनाम  हुए  तो क्या  हुआ,
अपनी   नजरों   में   हमको  बसा  लीजिए|
अपने    चेहरे   से  घूँघट   हटा     दीजिए  ||

Wednesday, 18 April 2012

ये दिल चाहता है

        
कृति - जीतेन्द्र गुप्ता

"तेरी झील सी आँखों में डूब जाने को दिल चाहता है
तेरी लहराती जुल्फों में खुद को छिपाने को दिल चाहता है
"
खोए रहते है तेरी ही यादों में 
न होश में आने को दिल चाहता है |
तेरी ही खुमारी छाई है  आठों पहर और
 जहान को भुलाने को द्दिल चाहता है|
दुनिया जहान की जितनी भी खुशियाँ है
वो तुझपर लुटाने को दिल चाहता है |
भूल गए थे रास्ता कालेज के आने का
तेरे लिए कालेज आने को दिल चाहता है|
भूल गए थे हम किताबें क्या होती है
अब कुछ कर दिखाने को दिल चाहता है |
हर सफल इन्सान के पीछे एक नारी होती है
वो तुझको बनाने को दिल चाहता है |
तेरी ही सूरत है मंदिर की मूरत में
तुझे खुदा बनाने को दिल चाहता है |
नही जानते हम ये मोह है या प्यार है
सब तुझपर लुटाने को दिल चाहता है||

Sunday, 15 April 2012

"उन्हें ना रही अब मुह्हब्बत"

कृति- मोहित पाण्डेय"ओम "

उन्हें ना रही अब हमसे मुहब्बत,
उन्होंने कहा अब हमें भूल जाओ |
उन्हें ना रही अब हमारी जरुरत,
उन्होंने कहा अब हमें भूल जाओ |

इंतजार कभी अब मत करना,
हमारी बीती दिल्लगी भूल जाओ |
पहले तो दिल में बसाया था उसने,
मगर अब कहा ये शहर छोड़ जाओ |

उन्हें ना रही अब हमसे मुहब्बत,
उन्होंने कहा अब हमें भूल जाओ |
नादान    दिल  ने     उनसे कहा,
पहले  हमारी  खफा   तो बताओ ||

नासमझी   से गर   भूल हो  गयी  हो,
तो इतनी बड़ी अब सजा मत  सुनाओ|
मर   भी  ना  पाएंगे   तेरे   हम  बिन,
जिन्दा दफन कर ना हमको   सताओ ||

उन्हें ना रही अब हमसे मुहब्बत,
उन्होंने कहा अब हमें भूल जाओ ||